कविता · Reading time: 1 minute

किसान शिकार हो रहा …

वो खींचता है
फिर सींचता है
लकीरें
गहरी लकीरें
अपनी किस्मत की लकीरें..

पेट-पीठ जोड़कर
हाड़-मांस निचोड़कर
संतान को
रूखा-सूखा परोसकर
शिकार हो रहा
किसान खेत का शिकार हो रहा ।

धरती को चीरकर
चट्टान को पीसकर
खून को निचोड़कर
हर आराम को छोड़कर
प्रकृति का कोप भोग रहा
किसान उद्योग का शिकार हो रहा।

वह व्यापारी है
भूख का
भरता है कुआ
पेट का
पेट बाँध कर सो रहा
शिकार हो रहा
किसान अन्न का शिकार हो रहा ।

खड़ा किया है
सम्राट और सुल्तानों को
व्यापार और बाजारों को
जोड़कर दिन-रात को
शिकार हो रहा
राजनीति की गंदगी ढो रहा ।

मिला क्या है.?
सिवाय मुफलिसी के
सूना आंगन और
कर्ज की जंजीरों के
तोड़कर देह को
किसान रो रहा
अन्नदाता इन्साफ खो रहा।

2 Likes · 2 Comments · 33 Views
Like
You may also like:
Loading...