किसान की दशा

उठ सवेरे मुंह अंधेरे पकङे दो बैलोँ कि डोर,वो जाता खेतोँ कीओर खुन के आंसू सोखता किसान,वो खेत जोतता किसान!
भूख ओर पयास मेँ,जिने की आस मेँ,खुद कि तकदीर ढूंढता उस घास मेँ,मेरी भी सुनेगा मालिक ये सोचता किसान,वो खेत जोतता किसान!
कब होगी बारिश,कब मिलेगा पानी,हुआ बुढा शरीर बीत गई जवानी,कभी रोता तो कभी खुद को रोकता किसान,वो खेत जोतता किसान
बिन फसल के कैसे जांऊ बाजार,बिन पैसेँ केसे मनांऊ तयौहार,कहे बलकार शाम को घर लोटता किसान,वो खेत जोतता किसान!

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