किसानों की दुर्दशा पर एक तेवरी-

सरकारी कारण लुटौ खूब कृषक कौ धान
रह गयौ बिना रुपैया, धान कौ हाय बुवैया |
दरवाजे पे कृषक के ठाडौ साहूकार
ब्याज के बदले भैया, खोलि लै जावै गैया |
करें खुदकुशी देश के अब तौ रोज किसान
न कोई धीर धरैया , कर्ज में डूबी नैया |
आलू-गेंहू सड़ गये बेमौसम बरसात
कृषक के दैया-दैया, उड़ि रहे प्राण-पपैया |
छीनौ भूमि किसान से, है सरकारी शोर
कृषक के दुःख पर भैया, सेठ की ताताथैया |
+रमेशराज

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