किसने चमन में हाय ये ख़ार बो दिए-

की थी बड़ी मशक्कत महकाने में गुलों के,
किसने चमन में हाए ये ख़ार बो दिए।
महफ़िल में अश्क छलके खुशियों का नाम धरके,
मौका मिला उन्हे तो चुपचाप रो दिए।
सारे जहां की खुशियां उन पर निसार दी।
पतझड़ की मार झेली, उनको बहार दी।
खुद हो गए बसंत , अब गुलज़ार हो लिए।

कश्ती थी जब भंवर में ,ओझल सा था साहिल, का
तूफानों से की थी जंग, मुश्किल से ढूंढ़ा साहिल।
किसने मगर ये मंजिल पर आके खो दिए।
शमा जली जतन से रोशन हुई जो राहें।
शमा की खूबियों से ये राह झिलमिलाए।
किसने किया है धोखा तूफ़ान जो दिए।
रेखा है चंद लम्हें, तूफान – गर्दिशों के
चुपचाप देख सब कुछ यूं उदास हो लिए।

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