किवाड़ या भय

ये केवल
किवाड़ नहीं हैं ।
ये जब बोलते हैं ,
तो सहम
जाती है माँ ।
ये जब हिलते हैं
तो ठिठक-से
जाते हैं पिता ।
इनका बंद रहना
अखरता है
हर किसी को ,
मित्रों को व
रिश्तेद़ारों को ।
ये हिलें या
हिलाए जाएँ ।
ये खुलें या
खोले जाएँ ।
तो एक
अनचाहा -सा
अनजाना -सा
भय ,आकर
सिमट जाता है
शाँकल और कुंदे
के दरम़ियान ।
ये जब
खटकते हैं ,
या कोई
खटकाता है इन्हें ।
तो कच्ची-नींद से
उठ जाती है
मेरी जवान बिटिया
और
फूँकने लगती है चूल्हा ।
अतिथि के
आगमन की
सूचना समझकर ।
बिटिया नासमझ है,
उसे नहीं मालूम
कि-कोई
नहीं आएगा ।
यदि आएगा तो
केवल साहूकार ,
जो व्याज बसूलकर
ले जाएगा ,
मूलधन की अमानत
हमें सौंपकर ।
शायद !
इसीलिए कसकर
चमीट लिया है,
इन किवाड़ों ने
खुद ही अपने-आप को ।

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