कितनों ने ओढे कफन

खोया जब-जब भीड़ ने, अपना होश-हवास ।
कितनों ने ओढ़े कफ़न,है किसको अहसास ।।

मारें पत्थर खींच कर.,कर को बना गुलेल !
दिल मे है जो भी जहर, पूरा रहे उड़ेल !!

मानवता की जीत का,सपना हो साकार !
यही सोचकर तोडिये, नफरत की दीवार !!
रमेश शर्मा.

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