गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कितने लगे घाव क़लम से

कितने लगे घाव क़लम से देखिये
मिज़ाज हमारा हो गरम से देखिये

ये मेरे देश को कौन बेचने लगा है
नहीं उठेगी निगाह शरम से देखिये

रोजाना सियासत होती टीवी पर
गफ़लत में यहां पे भरम से देखिये

खवाबो के महल में चलते दोनों
मिलान में शब्द तुम हम से देखिये

तुम्हारे मौन पर मेरी खमोशी बड़ी
जिंदगी में होते है यूँ गम से देखिये

काश पढ़ लेते मेरी निग़ाहों में तुम
उकेरी कागज पे आँखें नम से देखिये

है अधूरे सपन गर पूरा कर दो तुम
उठाकर निगाह बस कसम से देखिये

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