Sep 6, 2016 · कविता
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कितने रावण मारे

कितने रावण मारे अब तक
कितने कल संहारे
मन के भीतर के रावण को
क्‍या
अब तक मार सका रे
तेरी अंतर्रात्‍मा षड्-रिपु में
उलझी पड़ी हुई है
इसीलिए यह वसुंधरा
रावणों से भरी हुई है
नगर, शहर क्‍या गली मोहल्‍ले
रावण भरे पड़े हैं
है आतंक इन्‍हीं का चहुँदिश
कारण धरे पड़े हैं
क़़द बढ़ता ही जाता है
हर वर्ष रावणों का बस
राम और वानर सेना की
लंबाई अंगुल दस
बढ़ते शीश रावणों के
जनतंत्र त्रस्‍त विचलित है
भावि अनिष्‍ट विनाश देख
बल, बुद्धि, युक्ति कुंठित है
वो रावण था एक दशानन
हरसू यहाँँ दशानन
नहीं दृष्टि में आते
राम, विभीषण ना नारायण
क्‍या अवतार चमत्‍कारों की
करते रहें प्रतीक्षा
देती हैं रोजाना अब
हर नारी अग्नि परीक्षा
कन्‍या भ्रूण हत्‍या प्रताड़ना
नारी अत्‍याचार
रणचण्‍डी हुंकारेगी
लगते हैं अब आसार
धरे हाथ पर हाथ बैठ
नरपुंगव भीष्‍म बने हैंं
कहाँँ युधिष्ठिर धर्मराज अब
पत्‍थर भीम बने हैं
होता शक्तिहीन नर,
भूला बैठा है
वानर बल
कब गूँजेगा जन निनाद
कब उमड़ेंगे जनता दल
होंगे नरसंहार प्रकृति
सर्जेगी प्रलय प्रभंजन
या नारी की कोख जनेगी
नरसिंह अखिल निरंजन
ऐसा ना हो नर
षड्-रिपु से
निर्बल हो डर जाए
कल का फिर इतिहास
कहीं नारी के नाम न जाए।

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Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul'
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1970 से साहित्‍य सेवा में संलग्‍न। अब तक 14 संकलन, 6 कृतियाँँ (नाटक, काव्‍य, लघुकथा,... View full profile
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