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*** कितने खुशख़त **

भूरचन्द जयपाल

भूरचन्द जयपाल

मुक्तक

June 11, 2017

कितने
खुशख़त
लिखे
मैंने तुझको
चिट्ठी
लौटती
डाक से
डाकिया
एक भी
नहीं लाया
शायद
मेरा
पत्र लिखना
तुम्हे पसन्द
नहीं आया
या फिर
दिल की बात
तुमने दिल में
आज तलक है
दबाये रखी
क्योंकि
कनखियों से
आज भी तुम
मुझे
बड़े प्रेम से
निहारा करती हो
क्या यह
प्रेम नहीं
जिस्म की
कारा में पला
ये प्रेम क्या हमें
एक कोमल तन्तु से
बांधे हुए
आज भी
जीवित नहीं है
जब मुझे चोट लगती है
तो आह अनायास
तुम्हारे दिल से
निकलती है
तुम अपने
अहम के आगे
मानो या ना मानो
हर-कारा कैद नहीं
हुआ करती
और
हरकारा हर चिट्ठी को
बांचा नही करता
आज डाक के
प्रतिरूप बदल गए हैं
डाकिया डाक
देने भले नही आता
ईमेल, जीमेल , मैसेंजर
सीधे विचार
आदान-प्रदान का बने
माध्यम इसीलिए
शायद किसी संवदिये की
आवश्यकता नहीं
जो हूबहू
आप के विचारों या
संवाद को किसी तक
पहुचा सके
क्योंकि
आज तो
सिसकिया भी
शब्द अभिव्यक्त
कर देते है
और दिल को
भावों से भर देते हैं ।
कभी कहते थे
डाकिया डाक लाया
ख़ुशी का पैगाम लाया
कोई दर्द ना लाया
डाकिया डाक लाया ।
?मधुप बैरागी

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Author
भूरचन्द जयपाल
मैं भूरचन्द जयपाल 13.7.2017 स्वैच्छिक सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना... Read more

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