गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

काफ़िर का ईमाँ

काफिर का ईमाँ

ज़ख्म दर ज़ख्म सहे इसकदर तन्हा
साँसे आयी भी तो अजनबी की तरहाँ

उसने चाही सदा ही खुशी की इनायत
हम लुटते रहे काफिर के ईमाँ की तरहाँ

तेरे लिखे वादों को खुद ही जला दिया
वरना मुकरते तुम, बाकी बातों की तरहाँ

हर दर्द को सहेज लिया मुकद्दर समझ कर
लुटा नहीं सकती उसे तमाम हासिल की तरहाँ

ना गिला, ना शिकवा, उस ‘खुदा’ से
बेबस मुझे वह लगता है आदमी की तरहाँ
-✍️देवश्री पारीक ‘अर्पिता’

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