काश! मैं पाषाण होता

काश! मैं पाषाण होता,
मेरे ह्रदय पर कोई पाषाण तो नहीं होता,
काल के आघात से विखर जाता,
वेदना से छटपटाकर नहीं रोता ।।
पूष की ठिठुरन होती,
या जेठ की अंगार तपन,
श्रावण का सत्कार होता,
या होता पतझड़ का रुदन,
सब कुछ होता जाना पहचाना,
इस धुंध में भटककर नहीं खोता ।।

काश! मैं पाषाण होता ।।

दीपक कुमार श्रीवास्तव “नील पदम्”

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like 2 Comment 2
Views 64

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share