Sep 26, 2017 · कविता
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काश! मैं परिंदा होता।

मेरी कलम से…….
संजय गुप्ता

*काश! मैं परिन्दा होता*

काश! मैं परिंदा होता,
जिसका न कोई जाति मज़हब होता।
धर्म के नाम पर न बंटा होता,
ईमान अपना कभी न खोता।।
काश! मैं परिंदा होता।।

मैं बेपरवाह अम्बर में उड़ता,
कभी हिन्दू की डाल पर,
तो कभी मुस्लिम की डाल पर बैठता।
काश! मैं परिन्दा होता।।

कभी मस्जिद की गुम्बद पर,
कभी मन्दिर की मुंडेर पर,
कभी गुरुद्वारे की धरती पर।
तो कभी गिरिजाघर की छत पर,
सब भेदभाव भूलकर विचरण करता।।
काश! मैं परिन्दा होता।।

सद्भावना न जाने कहाँ खो रही है,
राष्ट्र विरोधी ताकतें नफरत का बीज बो रही हैं।
धर्म निरपेक्षता के नाम पर,
देखा तिरंगा शर्मसार होता।।
काश! मैं परिन्दा होता।।

नफरत फैल रही है तेज़ी से,
भाईचारा वज़ूद अपना खो रहा है।
कोई हक छीन रहा है,
तो कोई हक के लिये रो रहा है।।
विश्वास दिख रहा अस्तित्व खोता,
काश! मैं परिन्दा होता।।

काश!वो सद्भावना फूल,
फिर से खिल जाए।
हिन्दू-मुस्लिम सिख-ईसाई,
फिर से गले मिल जाएं।।
जागो मेरे साथियो जागो,
“संजय” न रहे ज़मीर ये सोता।
काश! मैं परिन्दा होता।।
कवि/पत्रकार संजय गुप्ता, मोगीनन्द (नाहन)
सिरमौर (हि0प्रदेश)??

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