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काश मुझे भी बिटिया होती

Kokila Agarwal

Kokila Agarwal

कविता

January 7, 2017

काश मुझे भी बिटिया होती
उसकी आंखो में खुद को जीती
महकी मेरी बगिया होती
मन की बाते मैं उससे करती

छन से टूटा ख्वाब मेरा ये
तन मन भी कुम्लाह गया
मेरे भीतर की बेटी का
मुझपर ही प्रहार हुआ

सिहर रही हूं सोच सोच ये
कैसे विदा मैं उसको करती
कैसे गले लगाती उसको
धड़कन कैसे उसकी गुनती

जब वो नम आंखो से हंसती
अधरो पे मुस्काहट खिलती
कुछ न कहकर सब कह देती
कैसे अनकही उसकी सहती

पल पल मिटती मिट कर जीती
खुशियां कांधे फिर भी ढोती
तुझसे मुझसे उलझे रिश्ते के
खोये सिरे बस ढूंढा करती

निरीह असहाय दूर खड़ी मैं
कैसे उसको ताका करती
इतनी टीसो से घायल हृदय को
किसकर मैं फिर सींचा करती

आज सुकूं बेटी न कोई
दर्द यहीं पा लेगा अंत
मुझमें सिमटा संग मेरे ही
खो जायेगा बन अनंत।

Author
Kokila Agarwal
House wife, M. A , B. Ed., Fond of Reading & Writing
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