.
Skip to content

काश! पुनः लौटें दिन…

सतीश तिवारी 'सरस'

सतीश तिवारी 'सरस'

कविता

March 20, 2017

चिट्ठियाँ नहीं आतीं अब
अपनों की
आते हैं कॉल
औपचारिकता निभाने
जबकि चिट्ठियाँ सिर्फ़
सम्बन्ध निभाने का जरिया नहीं
अपितु परिचायक होती थीं कि
लिखी गयीं वह
भीतर से उठने वाली हूक़ के सहारे
प्रेम को परिभाषित करने
काश! पुनः लौटें वह दिन
*सतीश तिवारी ‘सरस’,नरसिंहपुर (म.प्र.)

Author
Recommended Posts
।।सिर्फ़ काली लड़कियां ।। - निर्देश निधि “सिर्फ काली लड़कियां” मेरी प्यारी बहन अन्नी आज तुझे हमसे बिछड़े हुए पूरे अट्ठाईस बरस हो गए, अगर... Read more
वर्चुअल इश्क़
वर्चुअल इश्क़ उधर तुम चैट पर जल रही होती हो कभी हरी तो कभी पीली और इधर वो तो बस लाल ही होता है. ऐप्स... Read more
एक शख्स यह भी ( कहानी )
एक शख्स यह भी" __________ रोज़ाना की तरह मैं उस दिन भी सुबह की सैर करके घर पर लौटा ही था कि याद आया चाय... Read more
दिन शायराने आ गए.......
यूं लगा दिन ज़िंदगी में शायराने आ गए अब गज़ल के काफिये हम को निभाने आ गए | अब बड़े भाई को दादा कौन कहता... Read more