काव्य रो रहा है

काव्य रो रहा है

***

साहित्य में रस छंद अलंकारो का कलात्मक सौंदर्य अब खो रहा है।
काव्य गोष्ठीयो में कविताओं की जगह जुमलो का पाठ हो रहा है ।
हास्य के साथ व्यंग की परिभाषा अब इस कदर बदल गयी है ।
हंस रहे है कवी स्रोता सभी नये सृजन के अभाव में काव्य रो रहा है ।।

***

डी के निवातिया

Like 1 Comment 0
Views 269

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share