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काव्य रो रहा है

काव्य रो रहा है

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साहित्य में रस छंद अलंकारो का कलात्मक सौंदर्य अब खो रहा है।
काव्य गोष्ठीयो में कविताओं की जगह जुमलो का पाठ हो रहा है ।
हास्य के साथ व्यंग की परिभाषा अब इस कदर बदल गयी है ।
हंस रहे है कवी स्रोता सभी नये सृजन के अभाव में काव्य रो रहा है ।।

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डी के निवातिया

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डी. के. निवातिया
डी. के. निवातिया
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नाम: डी. के. निवातिया पिता का नाम : श्री जयप्रकाश जन्म स्थान : मेरठ ,...
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