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*”काव्य और अनुभूति”*

Dr. Mahender Singh

Dr. Mahender Singh

कविता

September 21, 2017

*”*बहने लगी रसधार दिलों में,
जाने उद् -भीत ..है कहां से,
बस जाता है ..चमन अलग से,
फूट पड़ते है ..झरने जाने कहां से,

संसार वही, ..बदल जाती है दुनिया,
रोम रोम …पुलकित हो उठता है,
बात रही बस तेरे और मेरे बीच में,

हर नाद में तू है,…हर साज है तेरा,
अब न दिन में उजाला है,
न अज्ञान में अंधेरा,
हर पुष्प में तेरी चमक है,

पक्षी गा रहे कलरव,
है तेरी शान निराली,
बंजर में भी फैल रही हरियाली,
गद्य की भाषा बन गई पद्म सम सुहानी,

डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,
काव्य का उद्-भव..
परम की अनुभूति में सबसे निकटतम

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Author
Dr. Mahender Singh
(आयुर्वेदाचार्य) शौक कविता, व्यंग्य, शेर, हास्य, आलोचक लेख लिखना,अध्यात्म की ओर !

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