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कालाहांडी, भूख और गरीबी !

ओडिशा: इस चुनावी समय में भी कुछ लोग अपनी जिंदगी कि जरूरी जरूरतों को लेकर आवाज़ बुलंद करने में पीछे नहीं हट रहे ,क्या कर सकते हैं, आश्वासन और जुमलों से जिंदगी तो नहीं चलती उसे चलाने के लिए रोजगार चाहिए और इसी रोजगार ने कालाहांडी में 2 को मौत, और कईयों को घायल कर अस्पताल तक पहुंचा दिया।
आप लोगों को कालाहांडी सुन कर कुछ याद आया क्या ? चलिए हम ही बताए देते हैं। ओडिशा में एक जिला है कालाहांडी जहां अस्सी के दशक में ऐसा सूखा परा था कि लोग एक-एक दाने को मोहताज हो गए थे। माओं ने अपने बच्चे तक को बेच दिए थे कुछ मुट्ठी अन्न और पैसे के लिए। बीतते सालों में इस्थिति पहले से सुधरी पर गरीबी वो कोढ़ है जो जल्दी कहाँ भरती है सदियां लग जाती है। उसी कालाहांडी की ये घटना है।
खबरों से पता चला कि कालाहांडी में वेदांता अल्मुनियम प्लांट के बाहर बड़ी संख्या में युवाओं कि भीड़ जमा थी। वो नौकरी और कम्पनी के स्कूल में अपने बच्चों का दाख़िला चाहते थे। इसी दरम्यान कुछ लोग खड़े हो कर नारे वाजी करने लगे ये देख कर OISF के जवानों ने उन्हें समझने की कोशिश की लेकिन तभी भीड़ में से किसी ने जवानों पर पत्थर फ़ेंक दिया जिसका नतीजा दो लाशों के रूप में सामने आया। पत्थर फेंकने पर जवानों ने भीड़ को चारो तरफ से घेर कर अंधाधुन लाठी चार्ज किया जिस के कारण बीस से ज्यादा लोग घायल होकर अस्पताल पहुंच गए और एक युवा कि अस्पताल में मैत हो गई। जिस से वहां के लोगों ने अपना आप खो दिया और अल्मुनियम प्लांट के कम्युनिटी सेंटर में घुस कर तोड़-फोड़ कि और उस के एक कमरे में OISF के जवान को बंद कर के आग लगा दी जवान को जिन्दा जला दिया गया। इस घटना के बारे में सुन कर अंदर तक हिल गई थी मैं इतनी भयानक दोनों मौत। ये कहना बिलकुल गलत नहीं होगा कि कानून को अपने हाँथ में लेने का किसी को अधिकार नहीं चाहे वो कोई भी क्यों न हो। लेकिन सोचने वाली बात है, इतनी बड़ी घटना का किसी भी बड़े मिडिया तंत्र ने छुआ तक नहीं। कारण क्या है,आखिर युवाओं के गुस्से की वजह को क्यों छुपाया जा रहा है किस चीज पर पर्दा डालने कि कोशिश है ? जो दोनों मारे गए दोनों ही गरीब थे अपनी अपनी जगहों पर दोनों निर्दोष तो दोसी कौन ? किस से ये सवाल पूछा जाय। क्या उन लोगों से जिन्होंने कालाहांडी के लगभग आधा दर्जन गावों के तीन हज़ार एकड़ जमीन लेते समय गांव वालों से वादा की थी कि फैक्ट्री बनने के बाद गांव के नैजवानों को नौकरी और वहां के बच्चों को कम्पनी के स्कुल में मुफ़्त शिक्षा दी जाएगी। लेकिन समय पड़ने पर अपने वादे से मुकर गया ‘वेदांता अल्मुनियम प्लांट’ का मैनेजमेंट। कम्पनी के वादे पर खड़ा उतरने के लिए आदिवासी युवाओं ने डिप्लोमा और डिग्री ले लिए लेकिन नैकरी नहीं मिली। बाहरी लोगों की बहाली होती रही पर वो मुँह ताकते रह गए। गरीबी और भूख सबसे बड़ा अभिशाप है जिस भूख इंसान को अपनी जान की भी परवाह नहीं करने देती और दूसरों के भी। परिणाम कालाहांडी के इस घटना के रूप में सामने आता है।
…सिद्धार्थ …

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मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय... लड़ने के लिए तलवार नही कलम को हथियार किया जाय थूक से इतिहास नही लिखा…
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