--कारण और कार्य--वंशस्थ छंद

वंशस्थ छंद की परिभाषा और कविता–
वंशस्थ छंद
————–यह एक वर्णिक छंद है।इसमें चार चरण या पद होते हैं।इसमें बारह अक्षर होते हैं;जो क्रमशः जगण,तगण,जगण एवं रगण के क्रम में आते हैं।
जगण=ISI
तगण=SSI
जगण=ISI
रगण=SIS
वंशस्थ छंद की कविता “कारण और कार्य”
—————————-/———————
बिना चले मंज़िल क्या कभी मिली।
बहार आई तब ही कली खिली।
कशीश होगी दिल में सुनो तभी,
जुबान से ये सच बात है चली।

हमें सदा धर्म अदायगी पढ़ी।
हमें सदा कर्म अदायगी गढ़ी।
चले इरादा कर सादगी लिए,
अदा हमारी सब के दिलों चढ़ी।

भला किया काम कला मिला चला।
सदा ढ़ला साख बना सिला पला।
हिला-हिला कष्ट कटा झुका टला,
फ़िदा हुआ ताज़ सजा खरा फला।

मज़ा तजा कर्म किया फला खिला।
सभी दिलों में सज भा गया लला।
हरा-हरा हाल हुआ झरा गिला,
कभी बुझा ना भजता चला गला।

राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”
———————————–

Like Comment 0
Views 204

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share
Sahityapedia Publishing