कविता · Reading time: 1 minute

काफ़िर

काफ़िर कहाने में मुझे कोई उज्र नहीं
सोचती हूं क्या खुदा वाकई रहा होगा ?
रहा भी गर होगा तो क्या
जूठी भात डबरे का पानी पीने को वो भी झुका होगा?
गर झुका होगा तो क्या उसी को सजदा कहा होगा ???
~ सिद्धार्थ

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