कविता · Reading time: 1 minute

कान्हा

फुर्सत मिले तो
वृन्दावन आ जाना
कान्हा
करती राधा इन्तजार
गोपियन संग

है फुहार
होली की
रंगों में डूबा है
वृन्दावन सारा

मिटें है सारे
भेदभाव मन के
मिले गले
लगाये गुलाल सब

है गुजिया की
सुगंध चहुंओर
खाते
बैठ सब लोग
है भाईचारे का
मिलन

होता
अत्याचारी का अंत
होती जीत सत्य की
देती है संदेश
होली सब को

दुनियां है
रंगों का सैलाब
स्पनिल सपनों
का फैलाव
फुर्सत मिले तो
आ जाना
पिचकारी लिये
जिन्दगी में

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

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