.
Skip to content

कानून तोड़ना (व्यंग्य)

Rajesh Kumar Kaurav

Rajesh Kumar Kaurav

कविता

October 20, 2017

‌‌‌‌‌‌‌गुलामी में तोड़ा था कानून,
आज भी पढ़ते इतिहास में।
सराहा जाता है उन्हें हरदम,
सम्मिलित जो नमक कानून में।
आज आजादी के बाद तोड़ते,
कानून ‌हम नित नए।
पर पूछता तक नहीं कोई,
कैसा है परिवर्तन।
हमने दहेज कानून तोड़ते,
देखा कई लोगों को।
बिना हेलमेट बाइक चलाते,
गौरव पाते लोगों को।
पालीथीन ‌पर रोक लगी,
ले जाते देखा लाखों को।
प्रतिबंध लगा ‌पटाखो पर,
जलते देखा ‌रातो को।
पर अंतर‌ देखा आजादी में,
नहीं पहुंचा कोई सलाखों में।
आजादी और गुलामी का,
फर्क जरा सा ‌है।
गुलामी में कानून तोड़ना,
जुर्म होता था।
आजादी में कानून तोड़ना,
बस एक तमाशा है।
राजेश कौरव सुमित्र

Author
Recommended Posts
आज के इन्सान को गरजते देखा।
????? आज के इन्सान को गरजते देखा। बेवजह हमहरते देखा। अपनी ही गलती पर शर्मिन्दगी की जगह चिखते चिल्लाते देखा। अपनी गलती को ढकने के... Read more
भूख और कानून
भूख और कानून... भूख क्या है? देखा एक बच्चा तो समझ में आया चूम रहा था जो शीशा नहीं प्रयास था कुछ खाने का खाना... Read more
मेरा सुनहरा सपना
सपने में सपना देखा अपनी मौत का सपना देखा अपनी मौत को करीब से देखा... कफ़न में लिपटे तन को देखाअपने जलते बदन को देखा.....हाथ... Read more
मौन
मौन मौन तुम्हारे स्वर कितने हैं,देखा आज भुजा,चरण,मुख,सर कितने हैं,देखा आज कवि कलम ने तुम को आज उकेरा है, फूलों संग पत्थर कितने हैं,देखा आज।... Read more