गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कागज़ के फूल ( प्रेम दिवस पर विशेष )

इश्क़ समझ बैठे हो तुम जिसे ,
हैं ये कागज़ के फूलों जैसे ।
पानी सा रंग रूप है घुल जाएगा ,
यह नहीं हिना का रंग हो जैसे ।
खुशबू भी बस चंद घड़ियों की ,
साँसों में समा सकेगी भला कैसे ?
इसकी नाज़ुक पंखुड़ी को छूने वालों ,
छूया है कभी किसी दिल को ऐसे ?
इसकी खुमारी है महज जिस्म तक ,
रूह तक इसका नशा रहेगा कैसे?
जो पल में घुल जाए ,मिट जाए ,
सच्चा इश्क़ तो नहीं होता ऐसे !
रहे जो जिंदगी के साथ ता उम्र ,
और मौत में भी न छोड़े हाथ ,
इश्क़ कहते हैं जिसे वो होता है ऐसे ।

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