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कागज़ के टुकड़े

Neeraj Chauhan

Neeraj Chauhan

कविता

November 16, 2016

बड़े लोग,
अब नही घुसते हैं मेरी गलियों में
बैठते नही है, ना ही बतियाते है,
एक मौन सा साध लेते है ऐसे लोग
जब मिलता हूँ,
क्योंकि भरोसा दिया हैं उन्होंने मुझे
मेरे ‘पुराने’ होने का
मेरे ‘पागल’ होने का
खुद के सयाने होने का,
अब नही करते वे कोशिश
मुझसे बात करने की
क्यों??
औकात पर तोलने लगे है मुझे
बेकाम बोलने लगे है मुझे
धातु के ठीकरों पर कसने लगे है
कागज़ के टुकड़ों में फसने लगे है
उन्ही कागज़ के टुकड़ों पर
जिन पर अकस्मात गाज गिरी आधी रात में
जो वास्तविक अर्थ में महज़ कागज़ के हो गए
ये देखकर भी की
खंडित हो गयी वो मान्यता
हां यह मान्यता ही तो है

कि जिसे समझते है हम दोस्ती,
जिसे समझते है हम रिश्ते,
जिसे समझते है हम प्यार
वो सिर्फ और सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा है
कागज़ के टुकड़े इंसान से बढ़कर नही

मुझसे बढ़कर नही,
मत कहो मुझे कि परवाह नही है
मेरे शब्द हमेशा तुम्हारी परवाह है..
मत कहो कि मैं पुराना हो गया हूँ
मेरे शब्द हमेशा नए रहेंगे तुम्हारे लिए..
मत कहो की अब मैं वैसा नही लिखता
जब भी लिखूंगा, बन आंसू बहूंगा
इसलिए मुझे तोलना तो सिर्फ मेरे

संघर्ष से
मेरी घुटन से
छटपटाहट से
‘कम उम्र के’ बड़े आंसुओ से
अधपकी जबरन हँसी से
रोज़ तपते, जलते मेरे पैरों से,
दो बूढ़ी आशाओं से,

अब से मत करना बात
इन कागज़ के टुकड़ों की.. .

– नीरज चौहान

Author
Neeraj Chauhan
कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।
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