गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कागज पे हालाते-दिल लिखते हुये इक दिन मौत आ जानी है

कागज पे हालाते-दिल लिखते हुये इक दिन मौत आ जानी है
मुझे मरते , तड़पते , बिलखते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

लापता है कई रास्ते मुझ में ,कल रात घर खोने के बाद से
वो गली वो शहर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

ये कोई मौसम ही होगा बारिशो का आँखों की बस्तियों का
नमी दिल की दीवारों से सूखते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

ये क्या हो गया देख दिल को मेरे हर घडी बिमार रहता है
मरिजें-दिल पे कोई दवा लगते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

बो दिया आँसुओ को दिल के सहरा में बस बहार आने दो
जख्मों पे दर्द के फूल खिलते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

जो दर्द है अभी मेरी आहों में है मेरे जख्मो की खलिश में है
लबों की ये खामोशी टूटते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

आ फसा जी के इस जंजाल में जहाँ साँसे बोझ लगने लगी
भीतर यूँ घुट-घुट के मरते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

सो जायेगी तमाम ख्वाइशें मेरे साथ हमेशा हमेशा के लिए
साँसों की थकान दूर करते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

मरने के बाद दर्दे-दिल-पुरव के कई नये नये राज खुलेंगे
तेरा नाम हथेली पर लिखते हुये इक दिन मौत आ जानी है !!

पुरव गोयल

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