कविता · Reading time: 1 minute

कांच का मरुस्थल

यह
कांच का मरुस्थल
कांच के दानों से बना
चमक रहा एक
शीशे सा
पांव जो इसपर पड़ा
तो यह चटका और
मेरा पांव इसमें धंसा
जख्मी कर दिया
इसकी खूबसूरती ने मुझे
इसके हुस्न के जाल में
फंसकर
मुझे देखा जाये तो
कुछ भी न मिला
मेरी आवाज भी
दूर दूर तक गूंजी पर
मेरे कदमों के निशानों को
छूकर गुजरता
कोई पीछा करता
मेरा हमशक्ल
मेरा हमकदम
मेरा हमनशीं
मुसाफिर भी न मिला।

मीनल
सुपुत्री श्री प्रमोद कुमार
इंडियन डाईकास्टिंग इंडस्ट्रीज
सासनी गेट, आगरा रोड
अलीगढ़ (उ.प्र.) – 202001

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