गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

काँटों में उलझा दामन हाथ अज़ाब रखता है……………….

काँटों में उलझा दामन हाथ अज़ाब रखता है
जो उल्फ़त के घर का पता गुलाब रखता है

आँखों में नमीं कहीं ना दिल में तिशनगी कहीं
अब सच्ची कहानियों की कौन क़िताब रखता है

देखो शायद तुम्हें भी कहीं मिल जाये कोई
अब तो ज़र्रों में ज़माना आफ़ताब रखता है

सोचो ना इक पल के कोई देखता नहीं मुझे
क़िताब-ए-रूह में रब सारा हिसाब रखता है

बमुश्क़िल बनता है गीत और बिगड़ जाता है
कैसा टूटा -सा ए दिल तू रुबाब रखता है

हो जाता रोशन वो रात के अंधेरों में
आसमान वाला भी एक माहताब रखता है

इतने तक़दीरों वाले सब नहीं होते यारो
‘सरु’ जैसों का ख़ाना ख़ुदा ख़राब रखता है

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