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काँटे!

हमने काँटो को बुरा कहा है
एक बार नहीं, बार बार !
मैंने जरा गौर से देखा!
जरा काँटो के बारे में सोचा
तो ,नजरिया बदल गया – – –
इन काँटो ने ही तो
चित्तार्षक गुलों को अपने आँचल में
जीवन दिया है-उनके होने से न होने तक!
उनके न होने में हमारे कोमल हाथ
भागीदार होते है- – –
और कह देते हैं – – –
देखो! काँटो में कितने सुंदर पुष्प खिले हैं ।
और फिर काँटो को बदनाम कर दिया।
यह कुछ नहीं ,बस ,हमारा नजरिया था ।
सच है; बुरा कुछ भी नहीं!
हमारी सोच ,हमारी डुबकी सोच के समंदर में कितनी गहराई तक लगी?
काँटे तो काँटे हैं!
फूल फूल हैं!
और हमारी आँखे हैं
इन्हें देखने के लिए ।

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Mukesh Kumar Badgaiyan,
Mukesh Kumar Badgaiyan,
Patharia
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