कहूँ या न कहुँ

आज एक ग़जल कहूँ या न कहुँ ।
तुझे खिलता कमल कहूँ या न कहुँ ।

चाहत-ए-जिंदगी की ख़ातिर ,
दिल-ए-दख़ल कहूँ या न कहुँ ।

बहता दरिया तोड़कर किनारों को ,
उसे आज समंदर कहूँ या न कहुँ ।

छूटता ही रहा एक लफ्ज़ कहीं कोई ,
उस सफ़े को सफ़ा कहूँ या न कहुँ ।

जीता न वो मेरी हार के वास्ते ,
उस जीत को हार कहूँ या न कहुँ ।

चलते रहे जो क़दम मेरे साथ से ,
उस अदा को वफ़ा कहूँ या न कहुँ ।

रह गया तख़ल्लुस जिस ग़जल में मेरा ,
उसे मैं मुकम्मिल ग़जल कहूँ या न कहुँ ।

….. विवेक दुबे”निश्चल”@…

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