कहीं प्रथा न बन जाए / डॉ. संतराम आर्य

मेरा बाप मरा सीवर के अंदर
मैं भी मर जाऊँगा
डर तो है इस बात का बेटे
मैं प्रथा बन जाऊँगा – मेरा बाप…
कुछ भी करके पेट पालना
चाहे मजदूरी कर लेना
मैला ढोने जैसी शिक्षा
कभी किसी को नही देना
मैंने ठानी है तुम्हें पढ़ाना
तुम मेहनत से पढ़ना
मेरी चिंता मत करना
सपने साकार कराऊँगा – मेरा बाप…
मैले से संस्कार हो मैले
विचार मैल में धंस जाएं
लिखना-पढ़ना याद रहे ना
जीवन भर पछताए
विद्या से भरपूर आदमी
जग में नाम कमाए
अच्छी शिक्षा दे कर तुमको
ज्ञान सम्मान दिलाऊँगा – मेरा बाप…
मेरी बात ध्यान में धर के
सबको यही समझाना है
दुनिया दौड़ी है तेजी से
हमें भी आगे जाना है
पीना पिलाना झगड़ा करना
विनाश की राह पर जाना है
तुम्हारे लिए संकल्प लिया है
इस जाति का कलंक मिटाऊँगा – मेरा बाप…
बस थोड़े दिनों की बात है पापा !
बच्चे हमें समझाते हैं
प्रथा हम नहीं बनने देंगे
स्कूल इसीलिए जाते हैं
बहन-भाई हम दोनों अव्वल
कक्षा में नम्बर लाते हैं
मैं सुन कर गदगद होता हूँ
क्या ऐसा कर पाउँगा – मेरा बाप…

💐 पुस्तक : कब तक मारे जाओगे (जाति-व्यवस्था के घिनौने रूप को ढोने वाले समुदाय पर केन्द्रित काव्य-संकलन) / संपादक : नरेन्द्र वाल्मीकि / पृष्ठ 240 / मूल्य : ₹160 (डाक खर्च सहित) / प्रकाशक : सिद्धार्थ बुक्स, दिल्ली। पुस्तक प्राप्त करने के लिए संपर्क करें। मो. : 9720866612

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