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कहीं दूर से आये बादल

कहीं दूर से आये बादल
सागर से पानी भर लाये बादल
शीतल-सुहानी हवा चल पड़ी
सूरज की गुस्सा ठंडा करने आये बादल ।

काले बादल ,भूरे बादल
हवा में उड़ते मतबाले बादल
कहीं खम्बे तो कहीं महल हैं
कहीं रुई की गठरी जैसे बादल ।

तड़क-भड़क कर बिजली कड़की
मूसलाधार बारिश बरसी
बह निकले है नदी और नाले
मेढकों के खुल गए सुरों के ताले ।

धरती पानी से सराबोर है
हर जगह बारिश का शोर है
हरियाली अब फूट रही है
धरती को रंगने आये बादल ।

पक्षी बूंदों में चहक रहे हैं
जानवर बारिश में मौज ले रहे
पेड़ पी रहे जी भर कर पानी
धरती की प्यास बुझाने आये बादल ।।

प्रशांत सोलंकी
नई दिल्ली-07
8527812643

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