कहानी -- वीरबहुटी

वीरबहु‍टी — कहानी– निर्मला कपिला

साथ सट कर बैठी,धीरे धीरे मेरे हाथों को सहला रही थी । कभी हाथों की मेहँदी कोदेखती कभी चूडियों पर हाथ फेरती, और कभी घूँघट उठा कर मेरे कानों के झुमके नथ और टिक्का देखती।मैं घूँघट से अपल्क उसे निहार रही थी।उम्र मे 25–26 वर्ष की लगती थी।शायद पेट से भी थी।रंग गोरा,चेहरा गोल,गुलाब की पँखडिओं जैसे लाल पतले होँठ और उसकी बडी बडी आंखों की मासूमियत उसकी खूब सूरती मे चार चाँद लगा रही थी।मगर इस मासूमियत मे भी मुझे लगा कि इन आंखों मे और बहुत कुछ है, कुछ अविश्वास ,कुछ सूनापन जाने क्या क्या जिसे मैं समझ नहीं पा रही थी। मेरी डोली ससुराल आये अभी दो तीन घन्टे ही हुये थे।मुझे पता नहीं था कि वो मेरी क्या लगती, है मेरा उससे क्या् रिश्ता है मगर वो मुझ से ऐसी व्यवहार कर रही थी जैसे मेरी और उसकी पुरानी जान पहचान है।पता नहीं क्यों, अबोध बालिका जैसा उसका प्यार मुझे अंदर तक प्रभावित कर रहा था।एक अनजान घर,अनजान लोग,ऎसे मे उसका प्यार मुझे साँत्वना दे रहा था, सहला रहा था ,——जैसे कह रही हो—–* मैं हूँ ना,क्यों घबराती हो?* मै कुछ आश्वस्त सी हुई। चलो कोई तो इस घर मे अपना हुआ।

*उस पगली को नई बहू के पास क्यों बिठा रखा है? पता नहीं क्या अनाप शनाप बक रही होगी?* बाहर से किसी पुरुष की आवाज़ आयी।

*बेटा तुम ही बुलाओ उसे,इतना काम पडा है, मेरा कहा कब मानती है?* ये किसी औरत की आवाज़ थी। शायद मेरी सासू जे की थी

वो जल्दी से उठ कर भागी, *ओह्! तुम्हें देख कर मै तो सब कुछ भूल गयी।*

मैं सोच मे पड गयी कि ये औरत कौन है? मुझे उस आदमी का उसे इस तरह कहना अच्छा नहीं लगा। पगली तो वो किसी तरह भी नहीं लगती थी—-मासूम जरूर थी। आवाज़ सुनते ही कैसे भाग गयी फिर कहना कैसे नहीं मानती? घर मे काफी महमान आये थे—सब खाना खा रहे थे। और वो भाग भाग कर सब के खिलाने लगी किसी को पाने किसी को सब्जी तो किसी को चपाती पूछती और हंस हंस कर बातें भी कर रही थी।उसकी आवाज़ मे एक खुशी ,एक उमंग थी।

जेब सभी खाना खा चुके तो वो मेरे लिये भी एक थाली मे खाना ले आयी।मेरी निगाहें इन्हें ढूँढ रही थीं कि शायद इकठै खाना खायें गे। वैसे भी जब से यहाँ आयी थी उसके बाद इन्हें देखा ही नहीं था।ाइसा भी क्या काम? —- शायद उसने मेरी निगाहों को पढ लिया था। वो हंसी—- पता नेहीं उसकी हंसी मे क्या था कि मन सहम सा गया—

*किसे ढूँढ रही हो ?ये तलाश तो सारी उम्र ही करती रहोगी!—चलो अब खाना खाओ–गाँव मे पति पत्नि साथ बैठ कर कहाँ खा पाते हैं—- दुल्हा दुल्हन तो बिलकुल नहीं । यहाँ ऐसे ही रिवाज़ है ।अज मैं तुम्हें अपने हाथ से खाना खिलाऊँगी।* मेरे ना ना करते भी उसने जल्दी से मेरे मुँह मे एक कौर डाल दिया। जाने क्यों मेरी आँख नम हो गयी।

*देखो मैं आज तक ऐसे एक कौर के लिये तरस रही हूँ।यहाँ कोई किसी को नहीं पूछता–ना कहता है कि खाना खा लो। खुद खा लिया तो खा लिया वर्ना भूखे सो जाओ।शिष्टाचार, भावनाये जानने का समय गाँव के लोगों के पास कम ही होता है। हाँ मै हूँ तो तुम्हारी जेठानी पर बहिन बन कर रहना चाहूँगी— क्या इस पगली को बहिन बनायोगी?*

*दीदी,कैसी बात करती हैं आप?मुझे अनजान जगह मे एक बहिन मिल गयी और क्या चाहिये?* और हम दोनो ने इकठे खाना खाया।ापने हाथ से खिलाते हुये उसकी आँखो मे तृप्ति का एहसास–मेरे मन मे आशा के एक किरण जगा गया।

अब मुझे पता चल गया था कि वो मेरी जेठानी है।मैने सुना था कि उसे पागलपन के दौरे पडते हैं।ाब तो उसे पागल कह कर ही बुलाया जाता था।इलाज अब भी चल रहा था। सब तरह के पागलों का एक ही इलाज होता है दिमाग को गोलियाँ खिला खिला कर सुलाने का! किसी की उमँगों को किसी गोली से कहाँ सुलाया जा सकता है? गोली संवेदनायो को कैसी सुला सकती है बस पल भर के लिये जब नीन्द आती है तब तक—-

मगर मुझे उसमे ऐसा कुछ नहीं लगा कि वो पागल है।मुझे लगा कि उसके अंदर कहीं गहरे मे कोई वेदना है कोई पीडा है, असुरक्षा और असमर्थता की भावना है। जो साथ पाते ही बाहर आना चाहती है।

*वर्षा {जेठानी का नाम} तो किसी से बात कम ही करती है।उदास, गुमसुम् सी रहती है उसे बोलते हुये कम ही सुना है।मगर आज तुम से खूब बतिया रही है। शायद पहली बार इसके चेहरे पर खुशी देखी है।*

पास बैठी औरत मुझे बता रही थी

अब मै जान गयी थी कि दीदी बहुत भावुक और संवेदनशील हैं। भावबायों को ना जाने कितने गहरे तक छुपाती रही हैं।ये भी सुना था कि जेठ जी बहुत गरम मिजाज और रूखे स्व्भाव के हैं।अखिर क्यों होती हैं ऐसी बेमेल शादियाँ! ग्रह और नक्षत्र मिलान किस काम का? क्यों उपर वाला उपर बैठा ये खेल खेल रहा है। औरत को अबला क्यों बनाया उसने? खुद ही उसकी इतनी बडी परीक्षा लेता है—- शायद भगवान भी पुरुष् है जो अपने मन बहलाने के लिये ही ऐसा करता है।—–

खाने के बाद सब बातें करते करते सोने लगे मैं जहाँ बैठी थी वहीं मेरा बिस्तर लगा दिया गया।पास मे ही 4-5 बिस्तर और थे जिन पर कुछ औरतें सो रही थीं। दीदी आईँ और

मेरी साथ बिस्तर पर बैठ गयी।मैं हैरान थी कि क्या मेरा बिस्तर यहीं लगेगा?क्या मेरा कमरा यहीं होगा? और मेरा नज़रें इन्हें ढूँढ रही थीं।

*बहू अब सो जाओ सुबह चार बजे उठना पडेगा।यहाँ शौचादि के लिये भी खेतों मे जाना पडता है। मैं तुम्हें ले जाऊँगी

सुबह जल्दी उठना होगा ,रिती रिवाज शुरू हो जायेंगे। और पितर पूजन भी होगा इस लिये सोचा कि सो ही जाऊँ नहीं तो कल बहुत थक जाऊँगी। लेट गयी मगर नीँद कहाँ आनी थी।माँ की याद आ गयी,पता नहीं वो भी सोई होगी कि रो रही होग और पिताजी त्प किसी के चुप करवाने पर भी चुप ना हुये होंगे बहुत लाडली थी उनकी।दूसरा इन की एक झलक देखने को मन उतावला था।ये कैसे रिती रिवाज़ हैं जब शादी ही हो गयी तो उनसे मिलने पर प्रतिबंध कैसा?गाँव के जीवन का पहला झटका लगा था मुझे।

फिर मेरी सोच पलट कर दीदी पर आ गयी।दूसरों के मन को कितनी जल्दी पढ लेती थी।वो पागल कैसे हो सकती है। जरूर् उनकी कोमल भावनायें जीवन के कटु यथार्थ से तालमेल नहीं बिठा पाईं। पर क्यों? ये जानना मेरी लिये भी जरूरी था । मेरे आने वाले जीवन की कुछ् कडियाँ भी इन से जुडी थी,जिनका भविश्य मैं उसकी आँखों के आईने मे तलाशना चाहती थी।

नये रिश्तों के सृजन की दहलीज़ पर खडी,मैं रिश्तों की आस्थाओं को उसके अनुभव से सीँचना चाहती थी।इस लिये उसकी भावनाओं को समझना जरूरी था। उन का विश्वास जीतना जरूरी था। सहसा मुझे लगा कि मेरी जिम्मेदारी बहुत बढ गयी है।

सुबह चार बजे उसने मुझे उठाया और खेतों की तरफ ले चली।घना अंधेरा था,पिछले दिन की बारिश से जमीन कुछ नरम थी।संभल संभल कर पैर रखना पडता था।मक्की के ऊँचे ऊँचे पौधों से भरे खेत मे जाते हुये डर लग रहा था। मन मे एक दूसरा भय भी था कि कहीं दीदी को पागलपन का दौरा ना पड जाये।डर के मारे टाँगें काँपने लगी थीं। दीदी आगे आगे चल रही थी वर्ना मेरे मन को पढ कर क्या सोचती? मन ही मन दआ कर रही थी कि घर सही सलामत पहुँच जाऊँ।

*बहु क्या तुमने कभी वीर्बहुटी देखी है?* अचानक दीदी पूछने लगी।

*नहीं* देखी तो थी मगर इस समय मैं बात करने की स्थिती मे नहीं थी।

*मैं दिखाऊँगी। कितनी कोमल मखमल की तरह उसका बदन होता है सुन्दर लाल सुर्ख रंग ।लोग पता नहीं क्यों उसे पाँव के नीचे मसल देते हैं।*

*———*

चुप रही इस समय कहां से वीरबहुटी का ख्याल आ गया?

उसने सहजे से एक वीरबहुटी जमीन से उठा कर टार्च की रोशनी अपने हाथ पर रख कर दिखाई।अनार के दाने जितनी सुर्ख मखमल जैसा जीव था।

*छोड दो दीदी नहीं तो मर जायेगी* मैने नीचे रखवा दी *वैसे भी ये इतना छोटा स जीव है कई बार बिना देखे किसी के पाँव के नीचे आ जाती होगी।*

*फिर भी ये जमीन को नुक्सान पहुँचाने वले कीडे खा लेती है इसका इतना तो ध्यान रखना ही चाहिये।*

मैं फिर चुप रही।

* और ये देखो,छल्ली भुट्टा} है *उसने छल्ली पर भी टार्च से रोशनी की * इसके दाने कितने सुन्दर हैं जसे मोटी जडे हों{ जरा सी छल्ली छील कर दिखाई और हंस पडी,— उन्मुक्त हंसी—- * मगर सुबह कोई आयेगा और जो सब से कोमल होगी उसे तोड कर ले जायेगा उसकी खाल खींचेगा और आग पर रख देगा अपना स्वाद और भूख मिटाने के लिये—-कोई किसी को अपनी मर्जी से जीने क्यों नहीं देता?*

मैं डर गयी। ये सुबह सुबह दीदी को क्या हो गया?कैसी बातें कर रही है।मुझे लगा इन चीज़ों का तो बहाना है असल मे मुझे अपने दिल की बात बताना चाहती है आज मुश्किल से तो उस बेचारी की बात सुनने वाला मिला है।मुझे लगा ये भी वीरबहुटी की तरह कोमल और असहाय है।

*दीदी आप सोचती बहुत हैं।भगवान ने एक विधा बना रखी है., सभी को उसमे बन्ध कर चलना पडता है। इस सृष्टी का हर जीव हर पदार्थ एक दूसरे पर आश्रित है। अच्छा बताओ अगर हर जीव अपनी ही मर्ज़ी से जीने लगे,एक दूसरे के काम ना आये एक दूसरे पर आश्रित ना हों तो ये संसार कैसे चलेगा? अगर नदी उन्मुक्त बहती रहे उसके किनारों को बान्धा ना जये तो क्या वो तबाही नहीं मचा देगी?भूख के लिये इन्सान इन पेड पौधों पर आश्रित है अगर इन्हें खाये नहीं तो क्या जिन्दा रह सकता है इन्हें काँटे छाँटे नही तो क्या ये जंगल नहीं बन जायेगा? ऐसे ही वीरबहुटी जीनी के लिये जमीन के कीडे मकौडे खा कर जीवित रहती है।*

*हाँ ये तो ठीक है।* वो कुछ सोच मे डूब गयीं।

* दीदी जीवन सिर्फ भावनाओं मे बह कर ही नहीं जीया जाता। उसे यथार्थ के धरातल पर उतर कर ही अपना रास्ता तलाश करना पडता है।

*बहु तुम्हारी बातें तो पते की हैं।* वो फिर से सोचने लगी।

मुझे आशा की एक और किरण दिखाई देने लगी। मुझे लगा कि मैं उसे जरूर एक दिन इस संवेदनशील मानसिक उल्झन से बाहर ले आऊँगी।उसके दिल की चोट की मैं थाह पा गयी थी।

नारी ही क्यों इतना आहत होती है़? ऐसी बात नहीं कि पुरुश आहत नहीं होता है , जब उसके अहँ पर चोट लगती है।नारी तब आहत होती है जब उसके कोमल एहसासों पर कुठाराघात होता है।पुरुश जिस्म के समर्पण को सरवोपरि मान लेता है जब की औरत रूह तक उतर जाना चाहती है।उसका समर्पण तब तक अधूरा्रहता है जब तक कोई उसकी भावनाओं को ना समझे उसके दिल मे ना उतर जाये।

कहते हैं पुरुष का सम्बन्ध मंगल ग्रह से होता है कठोर, अग्नि तत्व, अहं,अपना अस्तित्व और जीत की कामना। मगर औरत का सम्बन्ध शुक्र ग्र्ह से होता है जो भावनाओं भावुकता कोमलता का प्रतीक है। जिसे खुद रोशन होने के लिये सूरज की रोशनी पर निर्भर होना पडता ह, फिर भी खुश है —-समर्पित है प्रकृति को रिझाने मे—शीतलता देने मे। औरत को तो रोने के लिये भी एक कन्धे की तलाश होती है।

शायद उसकी ये तलाश खत्म हो ही नहीं सकती।जीवन नदी के दो किनारे हैं । स्त्री और पुरुष, साथ साथ तो चलते हैं—– ,समानाँतर रेखाओं की तरह—— मगर एक नहीं हो सकते1

वापिस घर पहुँच कर जान मे जान आयी।तैयार होने से लेकर पितर पूजन तक वो मेरे अंग संग रही। दोपहर का भोजन भी उसने मेरे साथ ही किया।शाम को वो मुझे घर के पिछवाडे वाले बगीचे मे ले गयी। कई तरह के फल सब्जियाँ तथा फलों के पेड लगे थे। वो कुछ सोच रही थी। झट्से उसने क्यारी से एक वीरबहुटी उठाई और हाथ पर रख कर सहलाने लगी।पता नेहीं मन मे क्या चल रहा था। फिर उसे जितनी भी वीर्बहुटियां दिखी सब को उठा उठा कर गुलाब के पत्तों पर रखती गयी।मैं समझ रही थी कि उसे डर है कि किसी के पैर के नीचे आ कर मर ना जाये। वो जरूर खुद को भी असुरक्षित महसूस करती होगी—- अजीब सी बेचैनी — जैसे किसी ने उसके अरमानों को कुचल दिया हो,उसके रंग रूप और वज़ूद को नकार दिया हो।उसे डर था कि किसी दिन वो भी इसी वीरबहुटी की तरह मसल दी जायेगी—।

*बहु आज सदियों बाद किसी ने ढंग से मुझसे बात की है।जब मैं कोई भी बात करती हूँ,बनती संवरती हूँ ,सब मेरा मजाक उडाते हैं,कभी डाँटते मारती पीटते भी हैं। क्या सच मे मैं पगली हूँ?

*नहीं दीदी,अप बहुत अच्छी और समझदार हैं। फिर हीरे की पहचान हर किस्र्र को थोडे ही होती है!जब तक बाकी पत्थरों मे पडा रहता है पत्थर ही रहता है।पर जब जौहरी के हाथ लग जाता है तो उसकी कीमत पडती है।मैं आपकी ज़िन्दगी को नये मायने दूँगी। अब आप अकेली नहीं हैं मैं हूँ ना आपके साथ । हम दोनो मिल कर सब ठीक कर लेंगी।*

उसकी आँख से एक आँसू टपका, मगर चेहरे पर सकून था। शायद ऐसे ही किसी कन्धे की उसे तलाश थी।जो प्यार और भावनायें वो पति से चाहती थी वो उसे नहीं मिली थी। मन मे एक डर सा बैठने लगा था कि क्या गाँव मे सभी का जीवन ऐसे ही होता है? मेरा कैसा होगा? —-

अगले दिन मैं मायके चली गयी।हम ने दो तीन दिन वहाँ रहना थ घर मे बहुत चहल पहल थी।जाते ही इनको मेरी बहनों और सहेलियों ने घेर लिया हँसते हंसाते दिन बीत गया।

अगले दिन सुबह सब नाश्ता कर रहे थे।–

अरे कोई फोन क्यों नहीं उठा रहा? कब से घन्टी बज रही है?*

रसोई से माँ की आवाज़ आयी। भईया ने फोन उठाया , सुनते ही जड से हो गये और इनकी तरफ देखने लगे।

*भईया क्या हुया?* इन्होंने पूछा।भईया ने कुछ कहने की बजाये फोन इन्हें पकडा दिया।

*क्या हुया?क्या हुया भाभी को?उधर से पता नहीं क्या कहा गया था।फोन रख कर ये धम्म से बैठ गये।

*भाभी की मौत हो गयी है—हमे अभी जाना होगा।* मैं सुनते ही सकते मे आ गयी।मुझे दुख और आश्चर्य इस बात का था कि कल वो ठीक ठाक थी और खुश भी थी।एक दम क्या हुया होगा? उस *वीरबहुटी* को अभी मैं सहला भी नहीं पाई थी

घर पहुँचे तो आँगन मे उसकी लाश पडी थी आसपास औरते बैठी रो रही थी।मैं जा कर उसके सिरहाने बैठ गयी। मेरे आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।दो दिन मे ही वो मेरे दिल तक उतर गयी थी।पास बैठी औरतें घूँघट मे ही धीरे धीरे आपस मे बातें कर रही थीं—शायद मुझे सुनाने और समझाने के लिये— * बहुत अच्छी थी भाग भाग कर सारा काम करती थी मुँह मे जुबान नहीं थी–कोई डाँटे फटकारे बस चुप सी साध लेती थीऔर क्यारियों मे कुछ ढूँढ्ने लगती थी। मैं समझ गयी कि जरूर वीरबहुटी को उठा कर सहलाती होगी— उसका डर शायद सच था।

मेरे पीछे दो और औरतें फुसफुसा रही थीं—— *आदमी गुस्सेबाज और रंगड[ रूखे स्वभाव का} था। भला हरदम कोई इस तरह अपनी पत्नि को मारता पीटता है?जाने किस ने ये गुलाब का फूल कु्रगँदल के सथ लगा दिया!बेचारी उन काँटों की चुभन नहीं सह पायी।कल कैसे सजी संवरी सुन्दर लग रही थी— देर बाद गहने कपडे ढंग से पहने थे।–अज रसोई मे जरा सा दूध उबल गया सास ने बेटे से शिकायत की कि देखो गहने कपडे मे ही ध्यान है दूध उबाल दिया—- बस पति ने गुस्से मे उसे बहुत मारा— बेचारी पेट से थी— बच्चा पेट मे ही मर गया। और साथ ही उसे ले गया।पता नहीं किसकी नज़र लग गयी बेचारी को?—-उसकी पतली सी चुन्नी मे से मैं उसे देख रही थी नज़र वाली बात करते उसने मेरी ओरे देखा था—- मन अजीब सी वित्रिश्णा से भर गया।

मेरे अंदर बेबस, क्रोध् और पता नहीं कितनी चिन्गारियां सी उठने लगीं। मैं नई बहु थी मुझे सभी पास बैठने से मना करने लगे।मगर आज मैं उसे एक पल भी अकेले नहीं छोडना चाहती थी—- कोई कुछ भी कहे –परवाह नहीं करूँगी—-।

औरतें उसे नहलाने लगीं थी अंतिम स्नान— कपडे माँग रही थी–कोई और ले कर आता इससे पहले ही मैं उठी अपना मेकाप का सामान और एक नयी लाल साढी निकाल लायी— औरतें हैरानी से मेरी ओर देख रहीं थीं मगर मुझे किसी की परवाह नहीं थी और मैं उनको एक संदेश भी देना चाहती थी— मैं वीरबहुटी नहीं *बीर वहुटी* हूँ।मैने बिना किसी की परवाह किये उसे सजाना शुरू किया।उसे सहलाया ,उसके गालों पर हाथ फेरा– आंसू टप टप उसके माथे पर गिरे।मुझे लगा अभी वो उठेगी और कहेगी —– बहु देखा ना मैने सच कहा था लोग वीर्बहुटी को कैसे कुचल देते हैं– तुम बहदुर— बीरबहुटी बनना –। मैने उसकी कलाई मे चूडियां पहनाई और उसके हाथ को दबा कर जैसे उसे दिलासा दिया कि चिन्ता मत करो—। तभी पीछे से एक औरत फुसफुसाई ——- *मुझे तो ये भी पगली लग रही है।*—

मन से फिर एक लावा सा उठा— मगर चुप रही उसे घूर कर देखा तो वो मेरी ीआँखों की भाषा जरूर समझ गयी और चुपके से वहां से खिसक गयी—

दीदी जा चुकी थी—छोटे छोटे मासूम पाँच बच्चों को छोड कर — जैसे उसे इस बात का विश्वास हो कि मैं सब सम्भाल लूँगी—।

रात को छत पर खडी आकाश की ओर देख रही हूँ—- एक तारा टूटा— कहते हैं टूटते तारे से जो माँगो मिल जाता है।मैने झट से आँख बँद कर दुया माँगी—*हे प्रभू दीदी को मेरी बेटी बना कर भेजना दीदी की तरह ही सुन्दर, प्यारी सी— मैं उसे वीरबहुटी[veerbahuti] नहीं बीर बहुटी[ beervahutee] बनाऊँगी जिसे कोई पाँव तले ना कुचल सके।—- और मुझे शक्ति देना कि मैं दीदी के बच्चों को माँ का प्यार दे सकूँ।*

निर्मला कपिला

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