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कहानी लंबी है पर छोटा सा किरदार मैं भी रखती हूँ..

suresh sangwan

suresh sangwan

गज़ल/गीतिका

December 8, 2016

कहानी लंबी है पर छोटा सा किरदार मैं भी रखती हूँ
ज़माने के साथ चल सकूँ इतनी रफ़्तार मैं भी रखती हूँ

नारी हूँ मैं अपनी कहूँ ना कहूँ कोई देखे ना देखे
गरचे घायल सी ख्वाहिशों का अम्बार मैं भी रखती हूँ

दुनियां की नज़र में उठने को गिर जाउं ए दौलत किसलिए
बहुत सी डिग्रीयां और अनेकों पुरस्कार मैं भी रखती हूँ

हवाएँ जब भी चलती हैं रिहाई कर देती हूँ तेरी ख़ातिर
दिल के चमन में ख़ुश्बूओं को ग़िरफ्तार मैं भी रखती हूँ

मेरी हसरतो अब मेरा कहा मानो जाओ किसी और नगर
पूरा नहीं कुछ तो मगर तुम पर इख्तियार मैं भी रखती हूँ

राह भूलने का बहाना बुरा नहीं क्यूंकि तू वाक़िफ़ है
तिरे दीद के पल का दिल ही दिल में इंतज़ार मैं भी रखती हूँ

देखा बदलते हुये इतिहास ‘सरु’ दुनियाँ को हिलते हुये
तलवार तो नहीं मगर क़लम-वाला हथियार मैं भी रखती हूँ

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Author
suresh sangwan

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