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कहां मन लगाएं (विश्व पर्यावरण दिवस पर मुक्तक)

कहां मन लगाएं
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मुक्तक-१
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सुनो जब रहेंगी नहीं ये हवाएं।
घिरेंगी नहीं खूबसूरत घटाएं।
मिलेंगी नहीं राहतें तन बदन को।
जरा सोचिए फिर कहां मन लगाएं।

मुक्तक-२
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धरा से हुई दूर जल की फुहारें।
बुझे प्यास कैसे जरा यह विचारें।
हसीं वादियों का है सौंदर्य गायब।
नयन आज रूठे घनों को निहारें।

मुक्तक-३
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प्रदूषण बहुत बढ़ गया हर जगह है।
तरक्की बनी आज इसकी वजह है।
जरूरत से ज्यादा लिया प्रकृति से।
इसी से हुई जिंदगी में कलह है।

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-सुरेन्द्रपाल वैद्य, ०५/०६/२०१९

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