गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कहां गए वो लोग ?

कहाँ गए वो लोग जिनकी आईने सी शख्सियत थी,
खुदा से जो उनको मिला दे ऐसी उनकी हैसियत थी ।

तबियत में सादगी औ ऊँचे ख़यालात जीने का ढंग,
जिन्दादिली और रहम दिली उनकी खासियत थी ।

वतन परस्ती में तो कोई उनका सानी नहीं होता था ,
लुटा सकें अपने तन-मन -धन , जांबाजी उनमें थी,

समाज के रहबर ,इंसानियत के पुजारी होते थे वो,
सड़े-गले रिवाजों /रिवायतों को तोड़ने की हिम्मत थी ।

बड़े-बुजुर्गों और नारी जाति के सम्मान,सुरक्षा और,
कमजोरों औ बेसहारों के हक वास्ते आवाज़ उठतीथी।

कर्म के फल के अपेक्षा कर्तव्य को महत्त्व देते थे वो,
कर्म-योग त्याग,दान ,धेर्य और तपस्या की पूंजी थी ।

दौलत-शोहरत का नशा न था ,न थी दिखावे की रीत ,
सच्चेऔर पाक ज़ज्बातों में बंधी रिश्तों की डोर थी।

मगर अब वोह बात कहाँ जो पहले ज़माने में थी कभी ,
अब वोह महान माताएं कहाँ जो इंसानों को जन्नतीथी।

वोह ज़माना था कहलाता था इंसानियत का स्वर्णयुग ,
अब इंसानियत मर चुकी है ये काला दिन सोचा न था।

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