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कहाँ

Brijpal Singh

Brijpal Singh

कविता

July 8, 2016

बतलाते हैं अमीर बहुत से
लोग शहरों के यहां
मगर मैं कभी जान न पाया
आखिर ये अमीरी कहाँ है
————–
मोल-भाव करते हैं वही
भरे रहते हैं जेब खूब
मुझे नहीं करना ये सब
फ़िक्र है बस एक रोटी कहाँ है
—————
हम ज़माने से खफा इसलिए
नहीं कि वज़ूद नहीं हमारा
तुम भी कम नहीं खुदमें
आखिर फिर दिखते कहाँ हो
—————
दो बूँद पानी कभी अमृत
है किसी के ले यहां
अभी अभी तो बारिश थी
हे ! बादल अभी कहाँ हो
———————-
सुख-दुःख तो
पहलू हैं ज़िंदगी के
दुःख ही दुःख दिखते हैं सबको
सुख वाले दिनों तुम कहाँ हो
————–
बहुत भ्र्ष्ट हो गया राष्ट्र
सब कहते हैं यही
तुम तो सही हो
आखिर दिखते कहाँ हो
________________________ बृज

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Author
Brijpal Singh
मैं Brijpal Singh (Brij), मूलत: पौडी गढवाल उत्तराखंड से वास्ता रखता हूँ !! मैं नहीं जानता क्या कलम और क्या लेखन! अपितु लिखने का शौक है . शेर, कवितायें, व्यंग, ग़ज़ल,लेख,कहानी, एवं सामाजिक मुद्दों पर भी लिखता रहता हूँ तज़ुर्बा... Read more

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