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कहाँ आ गया हूँ ?

कल सुबह से घर पर बैठे-२ थक चुका था और मन भी खिन्न हो चुका था शुक्रवार और रविवार का अवकाश जो था, तो सोचा कि क्यो ना कही घूम के आया जाए| बस यही सोचकर शाम को अपने मित्र के साथ मे पुणे शहर की विख्यात F. C. रोड चला गया, सोचा क़ि अगर थोड़ा घूम लिया जाएगा तो मन ताज़ा हो जाएगा, थकान दूर हो जाएगी||

शाम के करीब ७ बजे थे, बहुत ही व्यस्त जीवनशेली के बीच लोग व्यस्तता के मध्य से समय निकाल शहर की सबसे व्यस्त सड़को पर घूमने आते है,कोई महँगी-२ कार चलाकर आया है तो कोई साथ मे ड्राइवर लाया है| पर यहाँ का नज़ारा भी अपने आप मे बहुत विचित्र होता है, सड़क के दोनो किनारे पगडंदियो पर लोगो का सैलाब और हज़ारो नज़रे कुछ ढूंडती हुई, लगे कि जैसे सबको किसी ना किसी चीज़ की ना जाने कब से तलाश है|

कुछ ही समय मे मै भी उस भीड़ का हिस्सा बन कर कही खो गया, बस चला जा रहा था एक ही दिशा मे| सड़क के दोनो किनारे दुकानो की कतारे जैसे कि अपने गाँव मे मेले मे होती थी और इन दुकानो पर लोगो का हुजूम लगे की मानो मंदिर मे प्रसाद बॅट रहा है| कुछ दुकाने कपड़ो की खरीदारी के लिए, तो कुछ खाने के शौकीन लोगो के लिए पूरी तरह से समर्पित लग रही थी| थोड़ी देर मै भी इसी भीड़ मे खोया रहा, अपने मित्र के कहने पर एक पोशाक भी खरीद ली और वापस लौटने का निर्णय किया||

वापस लौटने के लिए मैने जैसे ही बाइक पार्किंग एरिया से बाहर निकली, एक व्यक्ति जो की साइकल पर था पास आकर बोला- “सर, आप एक गुब्बारा खरीद लीजिए मेरी बेटी भूखी है सुबह से कुछ नही खाया है हम दोनो ने, मै भूखा सो सकता हूँ पर बच्चा नही सो पाएगा” | एक पुरानी सी साइकल जिस पर कुछ गुब्बारे लगे थे, साथ मे ही एक गंदा सा थैला लटका था जिसमे शायद कुछ रखा था, साइकल के आंगे फ्रेम पर एक छोटी सी(शायद २ या ३ साल की) लड़की बैठी थी जिसको देख कर लगा की ना जाने कब से भूखी है, मुझे लगा क़ि
ये अचानक मै कहाँ आ गया हूँ ? क्या अभी भी लोग २ वक़्त की रोटी को मोहताज है? क्या लोग अपने आसपास की वास्तविकता को देखना नही चाहते? क्या हम सब अपने आप तक सीमित हो चुके है? कहाँ है रोज़गार गारंटी क़ानून ? ऐसे ही ना जाने कितने सवालो को अपने मन मे लिए, उस साइकल वाले व्यक्ति के हाथ मे कुछ पैसे थमा कर वापस चला घर आया||

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शिवदत्त श्रोत्रिय
शिवदत्त श्रोत्रिय
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