कहने को हमसफर हैं

कहने को हमसफर हैं
मगर संग नहीं,
संग होता गर
और के संग
की तुम्हें दरकार ना होती ।

संग होता गर,
तो सच और झुठ
छुपम और छुपाई
का खेल ना होता ।

संग होता गर
कोई कुछ यूंंही
कह ना पाता ।

संग होता गर
मेरे अपमान पे
यूं ज्ञानेन्द्रियां बंद ना होती ।

कहने को हमसफर हैं
पर संग नहीं,
संग होता गर
तो दर्द का अहसास ना होता ।

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like 1 Comment 0
Views 37

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share