कविता · Reading time: 1 minute

कहतें है हम थानेदार

कुछ लोग माशूक़ ऱखते है हम इज्जतदार मूंछ ऱखते है

चाँद की शरारत जैसे अपने अफसाने भी है ,सरकार
फिर भी बुझती ज्वालामुखी नहीं दिल को स्वीकार
समाजिक आडम्बर को तोड़े कहतें हम है थानेदार

प्रेशर कुकर की तरह अब हम पकना नहीं चाहतें
उल्टे सीधे काम करकें, कभी फंसना नहीं चाहतें
हमकों भी देखना होता यारों अपना घर परिवार
समाजिक आडम्बर को……..

नहीं किसी से कोई कमीशन हम कभी है खातें
जमा पूंजी इलेक्शन कमिश्नर को नहीं गिनवाते
लोग कहतें पुलिस समय पर आने की है ठेकेदार
पुलिस देख पेशाब करने वाले करतें ऐसी मुँहमार
सामाजिक आडम्बर तोड़ें………

ठाणे परिवार में बैठे हो तो जैसे हम सबको खलते है
जैसे सरकारी नोकरी पर नहीं टुकड़ों पर ही पलते है
हमकों बताते मामा और जेल को हमारी यह ससुरार
समाजिक आडम्बर तोड़े…….

हर धर्म वालें पोंगा पंडितो बदमाशों को यह पैगाम
मय्यसर नहीं आराम हमकों घण्टो भर करतें है काम
लहुलुहान करतें उसको हम जो है समाज के गुनाहगार
समाजिक आडम्बर तोड़े………

अशोक सपड़ा हमदर्द

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