“कस्तूरी कुंडल बसे , मृग ढूंढे बन माहि” समाधान स्वयं में ही छिपा है

आज के इस आपाधापी के युग में हर व्यक्ति अनेक प्रकार की समस्याओं से घिरा हुआ है कोई न कोई ऐसी समस्या हर व्यक्ति के जीवन में है जिससे पीछा छुडाने के लिए वो हर सम्भव प्रयास करता है लेकिन विडम्बना ये है की जैसे ही वो एक समस्या से पीछा छुड़ाता है तो उसी समय दूसरी समस्याएं मुंह फाड़ के उसे निगलने के लिए तैयार खड़ी रहती है| व्यक्ति के जीवन में इस प्रकार कई समस्याएं आती-जाती रहती है, जिनमे से कुछ ही समस्याओं का हल हो पाता है, अधिकांश तो उलझी ही रह जाती हैं। उस अपूर्णता का कारण यह है कि हम हर समस्या का हल अपने से बाहर ढूँढ़ते हैं जब कि वस्तुत: इनका हल हमारे भीतर ही छिपा रहता है। हर व्यक्ति अपने मन के अनुरूप परिस्थितियाँ प्राप्त करना चाहता है| लेकिन व्यक्ति आकांक्षाएँ करने के पूर्व, अपनी सामर्थ्य और परिस्थितियों का अनुमान लगालें और इसी के अनुसार चाहना करें तो उनका पूर्ण होना विशेष कठिन नहीं है। एक बार के प्रयत्न में न सही, सोची हुई अवधि में न सही, पूर्ण अंश में न सही, आगे पीछे न्यूनाधिक सफलता इतनी मात्रा में तो मिल ही जाती है कि काम चलाऊ संतोष प्राप्त किया जा सके पर यदि आकांक्षा के साथ-साथ अपनी क्षमता और स्थिति का ठीक अन्दाजा न करके बहुत बड़ा-बड़ा लक्ष्य रखा गया है तो उसकी सिद्धि कठिन ही है पर यदि अपने स्वभाव में आगा पीछा सोचना, परिस्थिति के अनुसार मन चलाने की दूरदर्शिता हो तो उस खिन्नता से बचा जा सकता है और साधारण रीति से जो उपलब्ध हो सकता है उतनी ही आकांक्षा करके शान्तिपूर्वक जीवनयापन किया जा सकता है। यदि हम कोई अपने स्वभाव की कमियों का निरीक्षण करके उनमें आवश्यक सुधार करने के लिए यदि हम तैयार हो जायें तो जीवन को तीन चौथाई से अधिक समस्याओं का हल तुरन्त ही हो जाता है। सफलता के बड़े-बड़े स्वप्न देखने की अपेक्षा हम सोच समझ कर कोई सुनिश्चित मार्ग अपनावें और उस पर पूर्ण दृढ़ता एवं मनोयोग के साथ कर्त्तव्य समझ कर चलते रहें तो मस्तिष्क शान्त रहेगा उसकी पूरी शक्तियाँ लक्ष को पूरा करने में लगेंगी और मंजिल तेजी से पार होती चली जायगी।
किसान खेत में बीज बोता है तो वो एक ही दिन में फलों से लदा हुआ वृक्ष नही बन जाता बल्कि बीज बोने से लेकर अंकुर पैदा होने, पौधे के बड़े होने, बढ़कर पूरा वृक्ष होने और अंत में फलने- फूलने में समय लगता है, प्रयत्न भी करना पड़ता है पर जो वृक्ष अभी बीज लेकर आज ही उसमें से अंकुर होते ही उसे पेड़ बनने और परसों ही फल-फूल से लदा देखने की आशा करते हैं, उनका उत्साह देर तक नहीं ठहरता। पहले ही दिन वे बीच में दस बार पानी, दसबार खाद लगाते हैं, पर जब अंकुर और वृक्ष सामने ही नहीं आता तो दूसरे ही दिन निराश होकर उस प्रयत्न को छोड़ देते हैं और अपना मन छोटा कर लेते हैं। उन बालकों की सी ही मनोभूति बहुत से व्यक्तियों की होती है। वे अधीरता पूर्वक बड़े-बड़े सत्परिणामों की आशाएँ बाँधते हैं और उसके लिए जितना श्रम और समय चाहिए उतना लगाने को तैयार नहीं होते । सब कुछ उन्हें आनन-फानन ही चाहिये। ऐसी बाल बुद्धि रखकर यदि किसी बड़ी सफलता का आनन्द प्राप्त करने की आशा की जाए तो वह दुराशा मात्र ही सिद्ध होगी । इसमें दोष किसी का नहीं अपनी उतावली का ही है। यदि हम अपनी बाल चपलता को हटाकर पुरुषार्थी लोगों द्वारा अपनाये जाने वाले धर्य और साहस को काम में लावें तो निराश होने का कोई कारण शेष न रह जायेगा। सफलता मिलनी ही चाहिए और ऐसे लोगों को मिलती भी है।
इसके विपरीत यदि हमारा मन बहुत कल्पनाशील है, बड़े-बड़े मंसूवे गाँठता और बड़ी-बड़ी सफलताओं के सुनहरे महल बनाता रहता है, जल्दी से जल्दी बड़ी से बड़ी सफलता के लिए आतुर रहता है तो मंजिल काफी कठिन हो जायगी। किसी कारखाने जब मशीने चलती है तो उन सब मशीनों को एक साथ इस प्रकार से जोड़ा जाता है की उनके तालमेल से मन चाहि वस्तु का निर्माण कर उसका लाभ प्राप्त किया जा सकता है इसी प्रकार एक ही लक्ष्य पर अपने मन मस्तिष्क को केन्द्रित करके चलने वाला व्यक्ति श्रेष्ठ उपलब्धियां प्राप्त करने में सफल होता है जबकि जल्द बाजी करने वाला उतावला व्यक्ति हताशा के गर्त में जा पढ़ता है| उतावला व्यक्ति ज्यों-ज्यों दिन बीतते जाते हैं त्यों-त्यों उसकी बेचैनी बढ़ती जाती है और यह स्पष्ट है कि बेचैन आदमी न तो किसी बात को ठीक तरह सोच सकता है और न ठीक तरह कुछ कर ही सकता है। उसकी गतिविधि अधूरी, अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित हो जाती है ऐसी दशा में सफलता की मंजिल अधिक कठिन एवं अधिक संदिग्ध होती जाती है। उतावला आदमी सफलता के अवसरों को बहुंधा हाथ से गँवा ही देता है।
किसी भी चीज़ की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को पुरुषार्थ के साथ प्रयत्न करना चाहिए और फल की आकांशा किये बिना ईश्वर पर विश्वास रखना चाहिए की जो कुछ भी प्राप्त होगा वो ईश्वर की कृपा ही होगी अभीष्ट वस्तु न भी मिले, किया हुआ प्रयत्न सफल न भी हो तो भी इसमें दु:ख मानने, लजित होने या मन छोटा करने की कोई बात नहीं है, क्योंकि सफलता मनुष्य के हाथ में नहीं है। अनेकों कर्तव्यपरायण व्यक्तियों परिस्थितियों की विपरीतता के कारण असफल होते हैं, पर इसके लिए उन्हें कोई दोष नहीं दे सकता। यदि अपने मन की असफलता की चिन्ता किये बिना अपने कर्तव्य पालन में ही जो संतुष्ट रहने लगे तो समझना चाहिए कि अपना दृष्टिकोण सही हो गया, अपनी प्रसन्नता अपनी मुट्ठी में आ गयी।

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