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कस्तुरी

Neelam Naveen

Neelam Naveen "Neel"

कविता

February 19, 2017

इस अक्षांश में जैसे
मुझे मेरे अंदर की
कस्तुरी से विमुक्त कर
मेरे मन का शोर
मौन को तोड़ता रहा
बारम्बार उन्मुक्त हो ।
जाने कितनी दफा मैं
ऐसे ही अंदर सफेद हो
बस पिघलता रहा कहीं
इस अनवरत विहंगम में
और तलाश लिए मैंने
सोये शब्द,खोये सपने ।
जो स्पन्दन से है कहीं
अन्जान तथाकथित वो
बादलों सा अस्तित्व लिये
मुझमें है भी, और नही भी
किन्तु मायने नही,कि वो हो
अब कस्तुरी विलुप्त ही सही।।

नीलम “नील”
देहरादून

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Author
Neelam Naveen
शिक्षा : पोस्ट ग्रेजूऐट अंग्रेजी साहित्य तथा सोसियल वर्क में । कृति: सांझा संकलन (काव्य रचनाएँ ),अखंड भारत पत्रिका (काव्य रचनाएँ एवं लेख ) तथा अन्य पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित । स्थान : अल्मोडा

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