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कसूर हो गया

नाजाने क्या ऐसा हमसे कसूर हो गया ।
जिसको गले लगा लिया वो दुर हो गया ।

मौसम के संग हम थे कभी खूब खिलते
बाहार आई पतझड़ की बेनूर हो गया।

हिसाब चाहता हूँ तुझसे मै ए जिदंगी
वक्त की पडी जो मार ये मजबूर हो गया ।

प्यार के बदले प्यार कभी मिला ही नही
जग का केसा ये अब मेरे दस्तूर हो गया ।

इस जिदंगी की दौड़ ने सब कुछ भुला दिया ।
लालच पैसो मे इतना मसरूर हो गया ।

न जानते थे कोई मुझे ना थे पास मेरे
मेहनत से आज मेरी मै मशहूर हो गया ।

मोहन को नफरतो ने सिखा दिया है सब
चाहत मे कितना तेरे मगरूर हो गया।

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Mohan Bamniya
Mohan Bamniya
Panipat Haryana
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प्रणाम दोस्तों मै एक साधारण जीवनशैली का व्यक्ति हूँ ।मैं कोई बड़ा लेखक-कवि नहीं हूँ...