कसूर किसका था

कसूर किसका था,
घटनाक्रम के बाद,
इस प्रश्न का औचित्य क्या?
सोचना था घृणित कार्य
होने से पहले,
क्यों परिस्थितियाँ यूँ बनी,
क्या विवश था कोई,
या महज आत्मानुभूति का किस्सा था,
जो भी था वो इसी,
समाज का हिस्सा था,
तो क्यूँ एक हिस्सा यूँ सड़ गल गया,
पनप ना पाया वह,
अच्छाईओं की छाँव में,
नैतिकता का रंग क्यूँ चढ़ ना पाया,
उस आत्मकेंद्रित पर,
जो था इस समाज का हिस्सा,
या कहें कि समाज ही,
शरण दे रहा था,
उसकी कुंठित भावनाओं को,
या उकसा रहा था उसके आवेगों को,
साँप निकल जाने पर लकीर पीटना,
परिपाटी दुहराने का यह किस्सा था,
जो भी था वो,
वो इसी समाज का हिस्सा था

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