कसक

महक मीठी सुनहरी रेत की मैं छोड़ आया हूँ
कसक काचर ओ मीठे बेर की मै छोड़ आया हूँ
जहाँ गूंजे कभी मरवण ओ मूमल के मधुर किस्से
धरा मीठे वो मरुधर देश की मै छोड़ आया हूँ
जरा सी चोट लगती है फ़साने याद आते है ,
हमें तो अब भी वो गुजरे जमाने याद आते है !
जरा सा रूठ जाने पर जिन्हें यूँ चोट लगती थी ,
हमीं को ढूंढते अपने सयाने याद आते है !

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