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कविता

फागुन आयो
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अलविदा बसंत
फागुन आयो
रंग बिरंगी
संग होली लायो
चंग ढप ढोल
डफली बजी
ढोल की थाप पर
नाचे नर नार रे
टेसू के फूल खिले
रंग करो तैयार
इन रंगों में छिपा
मधुर प्रेम व्यवहार
होलिका जलेगी
सब होली मनाएंगे
राक्षसी वृतियां जलेगी
होगा पाप का
धर्म का प्रह्लाद बचेगा
होगी हरि की जयकार
आयो फागुन को त्योहार
मौसम में सूरज की गर्मी
लगती नहीं अब अच्छी
बैठ न पाते कोई धूप में
फागुन की ये गर्मी
लठमार बृज की होली
और बिहारी जी के दर्शन
फागुन की ये रेलमपेल
देखो कैसे कैसे खेल
कवि राजेश पुरोहित

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