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ग़ज़ल

उत्तर प्रदेश के कैराना की हालत को बयान करती एक ग़ज़ल
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ग़ज़ल
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ज़ुबाँ पर ख़ौफ़ के ताले, दिलों में दर्दे रूखसत है।
बिकी जो मोल मिट्टी के, करोड़ों की विरासत है।

ये कैसे दौर से दो चार है तू, शहरे कैराना;
किसी पर मौत का साया, कहीं लुटने की दहशत है।

बचाकर जानो’ इज़्ज़त भागने की मुश्किलों में हम;
किसी को क्या बतायें, हर जगह ज़ालिम सियासत है।

भिड़ेगा कौन उन बेख़ौफ़ मुजरिम सरगनाओं से;
जिन्हें सत्ता की शह पर, मिल रही भरपूर ताक़त है।

पलायन की शिकायत भी किसी से कर नहीं सकते;
उन्हें ख़ामोश ही रहना है, ऐसी ही हिदायत है।

कई लोगों को तो ये सब, दिखाई ही नहीं देता;
अजब मासूमियत उनकी, ग़ज़ब उनकी नज़ाकत है।

हज़ारों हिन्दुओं की बेबसी पर, ऐसी ख़ामोशी;
भला है कौन कुर्सी पर, भला किसकी हुकूमत है।

कई कश्मीर गुपचुप पल रहे हैं देश के भीतर;
किसे तफ़तीश की फ़ुरसत, किसे इसकी इजाज़त है।

सियासतदान कुछ, इस देश को बरबाद कर देंगे;
कोई माने न माने, पर यही सच्ची हक़ीक़त है।

—-बृज राज किशोर

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Brijraj Kishore
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