कविता

“बेटियाँ”
अब परिचय की मोहताज नही बेटियाँ
आज माँ पिता की सरताज हैं बेटियाँ ।

गंगा जैसी निर्मल,अग्नि सी निश्च्छल
शीतल समीर की झोंका हैं बेटियाँ ।

प्राण वायु हम सबकी जीवन की होती
होती घर परिवार की गले हार बेटियाँ ।

प्रेम निवेदन की साकार सच्ची रूप ये
वंशवेल की खूबसूरत फूल हैं बेटियाँ ।

ये सेतू जो दो दिलों को सदा है जोड़ती
आज क्या-क्या न सह रहीं, ये बेटियाँ ।

प्रकृति के आँगन मे,रंगों से भरे जीवन मे
क्यों हो रही रंगों से अनजान ये बेटियाँ ।

आँखों से जान जाती सब का दर्द सारा
जीते जी देख रही हैं नर्क का द्वार बेटियाँ ।

रोज घटते जा रहा आवादी भ्रूण हत्या से
हो रही आज बुराईयों की शिकार बेटियाँ ।

आइए नारा लगाऐं, हम भी आवाज उठाऐं
हर घर अलख जगाकर बचाऐंगे बेटियाँ ।

हे विश्व हो तैयार,करो तैयार अपनी बेटियाँ
बजा दें अपनी मूक सितार हमारी बेटियाँ ।

प्रमिला श्री तिवारी, स्वरचित किविता,

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

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