कविता

*यादें*

आज फटे गत्ते की
उस डायरी में
पीछे छूटी यादों का
एक पुलंदा मिला रिश्ते निभाते हुए
बिसराया हुआ पतझड़ का
एक गुलाब मिला।
दम तोड़ते पृष्ठों पर
काली स्याही से लिखा
मेरा मासूम बचपन मिला अधरों पर प्यारी सी
मुस्कान चहकने लगी
डायरी के पुराने पन्नों में जीवन का हरेक
अनमोल लम्हा मिला।
मुड़े हुए पृष्ठ को खोला-
यादों के झरोखे से
चुपचाप झाँकता
चंचल बचपन मिला
देखते ही मेरे अधरों पर
असमंजस का फूल खिला
शुरू हो गया तन्हा पाकर
यादों का वो सिलसिला।

कितना मोहक था वो बारिश में काग़ज़ की
कश्ती का बहाना भीगती नानी के सिर पर
छप्पन छेदों वाली
फिर छतरी लगाना
दादाजी के हाथों में
जर्ज़र सी लाठी थमाना।

फटे बटन की शर्ट
में एक गाँठ लगाना दूधिया पैरों से छलांग लगा
गंदे छींटों में नहाना
छीं-छीं करते हुए
नरम मुट्ठियों में माँ के पल्लू को पकड़
गीले बाल सुखाना।
भोर में कंधों पर अपने
किताबी बोझ लादना
आड़े-तिरछे पैर पटकते
स्कूल भागना।
चोरी -छिपे दूसरे का
टिफिन निकालना
स्कूल की घंटी बजते ही
बस्ते को लादना,
झोली फैलाए पेड़ ताकते
इमली को गिराना पेड़ की छाँव में बैठ
एक- दूजे को खिलाना। झूला झूलते हुए
साथी को ले पेंग बढ़ाना
नन्हें हाथों से रस्सी थामे
सुंदर सहज स्वप्न सजाना।
आधे फटे पृष्ठ से
झाँकता मिला — खिलखिलाता , मुस्कुराता
अनमोल पलों का बचपन। कोई लौटा दे मेरा
बीता हुआ कल धुँधली यादों में छिपा
चंचल, अनमोल पल।।
डॉ. रजनी अग्रवाल”वाग्देवी रत्ना”
वाराणसी(उ.प्र.)
संपादिका-साहित्य धरोहर

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