कविता

*दीवारें*

विश्वासी ईंटों से निर्मित
थी अटल दीवारों की हसरत,
लेप स्वार्थ का लगा दिया
व्यापी जिसके भीतर नफ़रत।

भाई-भाई के बीच खड़ीं
मतभेद करातीं दीवारें,
अपनों का उपहास उड़ाकर
क्यों सज़ा सुनातीं दीवारें?

तनी हुईं ये अहं भाव से
टूटे लोग लिपट रोते हैं,
अपवादों की कील ठोककर
दृढ़ संबंधों को खोते हैं।

संदेहों की दीवारों से
घर किसके आबाद हुए हैं,
दीवारों के कान जहाँ हों
लोग वहीं बर्बाद हुए हैं।

मिट्टी, गारे की दीवारें
ताक रहीं खंडित रिश्तों को,
सीलन से गिरती दीवारें
कौन भरेगा अब किश्तों को?

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’
वाराणसी(उ.प्र.)
संपादिका-साहित्यधरोहर

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