कविता · Reading time: 1 minute

कविता

*दीवारें*

विश्वासी ईंटों से निर्मित
मजबूत दीवारों की हसरत,
लेप स्वार्थ का लगा दिया
व्यापी भीतर जिसके नफ़रत।

भाई-भाई के बीच खड़ीं
मतभेद करातीं दीवारें,
अपनों का उपहास उड़ाकर
क्यों सज़ा सुनातीं दीवारें?

तनी हुईं ये अहं भाव से
टूटे लोग लिपट रोते हैं,
गाली की दो कील ठोककर
दृढ़ संबंधों को खोते हैं।

संदेहों की दीवारों से
घर किसके आबाद हुए हैं,
दीवारों के कान जहाँ हों
लोग वहीं बर्बाद हुए हैं।

मिट्टी, गारे की दीवारें
ताक रहीं खंडित रिश्तों को,
सीलन से गिरती दीवारें
कौन भरेगा अब रिश्तों को?

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’
वाराणसी(उ. प्र.)
संपादिका-साहित्य धरोहर

38 Views
Like
Author
 अध्यापन कार्यरत, आकाशवाणी व दूरदर्शन की अप्रूव्ड स्क्रिप्ट राइटर , निर्देशिका, अभिनेत्री,कवयित्री, संपादिका समाज -सेविका। उपलब्धियाँ- राज्य स्तर पर ओम शिव पुरी द्वारा सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार, काव्य- मंच पर "ज्ञान…
You may also like:
Loading...