Jun 16, 2016 · कविता
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पत्थरों को तोड़ती

वह मजदूरन

पत्थरों को तोड़ती
नज़रें कहीं न मोड़ती
लक्ष्य को भेदती
श्वेद बहाती।
अथक परिश्रम
मन में न गम
गीत गुनगुनाती
धूप चिलचिलाती
ईंटें सिर पर उठाती
घोलती गारा
मन कभी न हारा
पराश्रमिक पाती
सहर्ष घर जाती
पकाती रोटियां
नमक प्याज संग खाती।
चैन की नींद सो जाती।

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Sharda Madra
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